Monday, August 17, 2020
Tuesday, May 23, 2017
Sunday, January 1, 2017
Sunday, December 4, 2016
प्रकृति भी हमारे अच्छे मित्र की तरह है ,,,सुन्दर ,,,निश्छल,,,
सच में कितना अप्रतिम एहसास है ये की मैं चल रहा हूँ एक अनजाने सफ़र में बिना थके बिना रुके बस अकेला तन्हा चला जा रहा हूँ काफी देर बीत गयी और कुछ देर मुझे अकेले पन का एहसास हुआ तो सोचा कुछ अलग किया जाए तभी मेरी नजर बस की खिड़की से बहार की तरफ पड़ी जहां प्रकृति अक अनुपम नजारा था और उनमे जैसे मैं खो गया उन्ही एहसासों में मैं खोया हुआ था की एक किसी पेड़ की पत्ती का टुकड़ा मेरे पैर पर आकर गिरा वो देखने में बहुत सुन्दर लग रहा था मैं उसे कुछ पल निहारता रहा फिर धीरे धीरे वो एक साथी की तरह बाते करने लगा जाने कब उससे मेरी मित्रता हो गयी और सच में वो एहसास वो आनंद अच्र्य्जनक था मेरे लिए सच में प्रकृति के मनोरम रूप में ओझल होना बहुत आसान है बस आपकी काल्पनिक शक्ति और सोचने की क्षमता सुन्दर और निश्छल होनी चाहिए फिर ये निर्जीव भी हमे जीवित से प्रतीत होंगे ,,,और जिन्हें हम पराया समझते है वो भी हमे अपनों से बढ़कर लगेंगे इसीलिए सच में ये जिन्दगी बहुत ही खूबसूरत है बस इसको बेहतर ढंग से जीने की कला आपको पता होनी चाहिए
आशा की जीवन डोर लिए ,,, जाने इधर उधर पथ में भटके ,,,
आशा की जीवन डोर लिए ,,,
जाने इधर उधर पथ में भटके ,,,
ना मंजिल का है पता उसे,,,
जाने क्यों व्याकुल मन है ये ,,,
कभी हँसता है ,,,
कभी रोता है,,,
कभी जागे ,,तो ,,
कभी सोता है ,,,
जाने कैसी परछाई है ,,,
स्पष्ट नही है ,,
धुंधली सी ,,,
जैसे अंधियारे में जाऊ ,,,
वो खो जाए ,,,
हाँ मन है मेरा मन पागल ,,,
जो ,,आशा की जीवन डोर लिए ,,,
जाने इधर उधर पथ में भटके ,,,
शब्दों पर है सयम जो नही ,,,
है शत्रु जमाना मेरा हुआ ,,,
मैं अपनी मनोदशा किस्से कहूं ,,,
जो उसके प्रेम में पागल हुआ ,,
सूखे पत्ते सा गिर जो गया ,,,
पैरों के तले रौंदा मैं गया
शीशे की तरह जो बिखर गया ,,,
फिर भी ,,बाहे फैलाए खड़ा रहा ,,
नैनो से बिन बादल नीर बहे ,,
आशा की जीवन डोर लिए ,,,
जाने इधर उधर पथ में भटके ,,,
जाने इधर उधर पथ में भटके ,,,
ना मंजिल का है पता उसे,,,
जाने क्यों व्याकुल मन है ये ,,,
कभी हँसता है ,,,
कभी रोता है,,,
कभी जागे ,,तो ,,
कभी सोता है ,,,
जाने कैसी परछाई है ,,,
स्पष्ट नही है ,,
धुंधली सी ,,,
जैसे अंधियारे में जाऊ ,,,
वो खो जाए ,,,
हाँ मन है मेरा मन पागल ,,,
जो ,,आशा की जीवन डोर लिए ,,,
जाने इधर उधर पथ में भटके ,,,
शब्दों पर है सयम जो नही ,,,
है शत्रु जमाना मेरा हुआ ,,,
मैं अपनी मनोदशा किस्से कहूं ,,,
जो उसके प्रेम में पागल हुआ ,,
सूखे पत्ते सा गिर जो गया ,,,
पैरों के तले रौंदा मैं गया
शीशे की तरह जो बिखर गया ,,,
फिर भी ,,बाहे फैलाए खड़ा रहा ,,
नैनो से बिन बादल नीर बहे ,,
आशा की जीवन डोर लिए ,,,
जाने इधर उधर पथ में भटके ,,,






