गुफ्तगू तुझसे करते करते कब हम अपने आपको भूल गये पता ही ना चला
Saturday, June 18, 2016
तन्हा ,,,,,,,,मुहब्बत
मै टूट कर जिसके लिए रोया
उसने इक बार ना पुछा की दिल को क्यों तडपाते हो
वो जिसके लिए मैंने सब कुछ था खोया
उसने इक बार ना पुछा की तुम क्यों चले जाते हो
की दिल को क्यों तड़पाते हो
अधूरा था अधूरा हु
न पूरा था ना पूरा हु
मैंने भी उनसे ये पुछा ख्वाब बनके तुम क्यों आते हो
की दिल को क्यों तड़पाते हो,,,मुझ अधूरे को ,,,,,,,,,अधूरा कर के चले जाते हो
उसने इक बार ना पुछा की दिल को क्यों तडपाते हो
वो जिसके लिए मैंने सब कुछ था खोया
उसने इक बार ना पुछा की तुम क्यों चले जाते हो
की दिल को क्यों तड़पाते हो
अधूरा था अधूरा हु
न पूरा था ना पूरा हु
मैंने भी उनसे ये पुछा ख्वाब बनके तुम क्यों आते हो
की दिल को क्यों तड़पाते हो,,,मुझ अधूरे को ,,,,,,,,,अधूरा कर के चले जाते हो
Thursday, June 16, 2016
वो कोयल की कूक सुन रहे थे हम
Earthcare Foundation NGO
10:05 AM
Kavita Sangrah
No comments
वो कोयल की कूक सुन रहे थे हम
लेकिन आज उसमे सुर नही था मिलन का
जाने वो किन ख्यालो में खोई थी
या विरह का दर्द था अपने सजन का
रोज सुनते थे उसकी कूक हम
तो उसके एहसासों को भी जान लेते थे
आज कुछ बात तो जरूर है
जो हम भी समझ न पाए उसका मन
तान कुछ थी शब्द कुछ थे उसके
उसको सुनके मेरा मन भी हो रहा था दुखी
बात मै भी करना चाहता था उससे
क्योकि उस राह से गुजरा था मै भी कभी
क्योकि उस राह से गुजरा था मै भी कभी
तेरी माँग भर के आज तुझे
Earthcare Foundation NGO
10:00 AM
Kavita Sangrah
No comments
तेरी माँग भर के आज तुझे
सिन्दूरी किया था हमने
वो हर पल हर लम्हा
जहन में समाया है
आज भी तू मन को मेरे
अपने आँखों के दर्पण में
आसुओ का सैलाब आया है
आंसुओ का सैलाब आया है
ये उन्ही हाथो से भरी थी माँग मैंने
आज उन्ही हाथो से तेरा कन्धा उठाया है
यु अस्को की नदी में भीग गया है मन मेरा
कोई मांझी मुझे आज बचाने नही आया है
की संग तेरे रहते हरदम
सताते रहते थे तुम्हे
तो आज उन्ही लम्हों ने मुझे खूब रुलाया है
वादा तुमने किया था साथ जियेंगे साथ मरेंगे
वादा तोड़ कर तुमने आज सितम ढाया है
सिन्दूरी किया था हमने
वो हर पल हर लम्हा
जहन में समाया है
आज भी तू मन को मेरे
अपने आँखों के दर्पण में
आसुओ का सैलाब आया है
आंसुओ का सैलाब आया है
ये उन्ही हाथो से भरी थी माँग मैंने
आज उन्ही हाथो से तेरा कन्धा उठाया है
यु अस्को की नदी में भीग गया है मन मेरा
कोई मांझी मुझे आज बचाने नही आया है
की संग तेरे रहते हरदम
सताते रहते थे तुम्हे
तो आज उन्ही लम्हों ने मुझे खूब रुलाया है
वादा तुमने किया था साथ जियेंगे साथ मरेंगे
वादा तोड़ कर तुमने आज सितम ढाया है
धुप सौतन सी लगती है ग्रीष्म ऋतू में सखी
शरद ऋतू में साजन सी लागे मुझे
बरखा में जैसे हो जाए ये बावरी
और बसंत में मनोहर सी लागे मुझे
धुप सौतन सी लगती है ग्रीष्म ऋतू में सखी
शरद ऋतू में साजन सी लागे मुझे
कभी तपती है ये कभी शीतल है ये
कभी आये जाये पता ही नही
कभी तडपा के हमपे कहर ढाती है
कभी तरसा के आके चली जाती है
कभी सावन सी दिल पे बरस जाती है
कभी ज्येष्ठ सी दिल को जला जाती है
धुप सौतन सी लगती है ग्रीष्म ऋतू में सखी
शरद ऋतू में साजन सी लागे मुझे
शरद ऋतू में साजन सी लागे मुझे
बरखा में जैसे हो जाए ये बावरी
और बसंत में मनोहर सी लागे मुझे
धुप सौतन सी लगती है ग्रीष्म ऋतू में सखी
शरद ऋतू में साजन सी लागे मुझे
कभी तपती है ये कभी शीतल है ये
कभी आये जाये पता ही नही
कभी तडपा के हमपे कहर ढाती है
कभी तरसा के आके चली जाती है
कभी सावन सी दिल पे बरस जाती है
कभी ज्येष्ठ सी दिल को जला जाती है
धुप सौतन सी लगती है ग्रीष्म ऋतू में सखी
शरद ऋतू में साजन सी लागे मुझे
क्या मन इस पर्वत से भी विशाल है
क्या ये आँखे समंदर से भी गहरी है
क्या ये दिल धडकता है सिर्फ उनके लिए
क्या ये नदी के किनारे बने है
हमेशा जुदा रहने के लिए
क्यों ये सूरज हमेशा तपता है
क्यों ये अम्बर नही बरसता है
क्यों ये धड़कन उनको देखकर के
कभी मद्धम होकर के रुक जाती है
क्यों पास रहके खुशियों का जहां मिल जाता
और दूर जाते ही सारा जहां लुट जाता
क्यों विरह में पीड़ा होती है
ये आँखे रह रह के क्यू रोती हैं
क्यों मुझे तोड़ करके शीशे सा
बेरहम वक़्त होके गुजरा है
क्यों इस क्यों का सवाल ढूंढे ये दिल
क्या खत्म होगी नही इसकी कहानी
अनजान राहो में क्यों खोया मेरा निर्मल मन
तन्हा तन्हा लगता क्यों तुम बिन जीवन
तन्हा तन्हा लगता क्यों तुम बिन जीवन
तन्हा तन्हा लगता क्यों तुम बिन जीवन

क्या ये आँखे समंदर से भी गहरी है
क्या ये दिल धडकता है सिर्फ उनके लिए
क्या ये नदी के किनारे बने है
हमेशा जुदा रहने के लिए
क्यों ये सूरज हमेशा तपता है
क्यों ये अम्बर नही बरसता है
क्यों ये धड़कन उनको देखकर के
कभी मद्धम होकर के रुक जाती है
क्यों पास रहके खुशियों का जहां मिल जाता
और दूर जाते ही सारा जहां लुट जाता
क्यों विरह में पीड़ा होती है
ये आँखे रह रह के क्यू रोती हैं
क्यों मुझे तोड़ करके शीशे सा
बेरहम वक़्त होके गुजरा है
क्यों इस क्यों का सवाल ढूंढे ये दिल
क्या खत्म होगी नही इसकी कहानी
अनजान राहो में क्यों खोया मेरा निर्मल मन
तन्हा तन्हा लगता क्यों तुम बिन जीवन
तन्हा तन्हा लगता क्यों तुम बिन जीवन
तन्हा तन्हा लगता क्यों तुम बिन जीवन
हु पथिक मैं अनजान राहो का है सिलसिला ये थकती निगाहों का
हु पथिक मैं अनजान राहो का
है सिलसिला ये थकती निगाहों का
है होठ थरथराते इस भवर में कही
धुंधला सा आसमा तेरी बाहों का
हु पथिक मैं अनजान राहो का
है सिलसिला ये थकती निगाहों का
राहे होती नही खत्म जिन्दगी की कही
इक डोर जो टूटी कई है भी जुडी
तपता सूरज भी लेता परीक्षा हर घडी
कब तक तन्हा चलू,मंजर है हुबहू
तुमने छोड़ दिया दामन तडपती आहो का
हु पथिक मैं अनजान राहो का
है सिलसिला ये थकती निगाहों का
मैं चलता रहा और चलता गया
समय भी हरपल मुझको छलता गया
मैंने माँगा नही था सिवा कुछ पल सुकून के
फूल की नही थी अभिलाषा मुझे
मन में ना ही कोई थी आशा नई
पग पग वो कांटे ही बिछाता गया
हु पथिक मैं अनजान राहो का
है सिलसिला ये थकती निगाहों का

है सिलसिला ये थकती निगाहों का
है होठ थरथराते इस भवर में कही
धुंधला सा आसमा तेरी बाहों का
हु पथिक मैं अनजान राहो का
है सिलसिला ये थकती निगाहों का
राहे होती नही खत्म जिन्दगी की कही
इक डोर जो टूटी कई है भी जुडी
तपता सूरज भी लेता परीक्षा हर घडी
कब तक तन्हा चलू,मंजर है हुबहू
तुमने छोड़ दिया दामन तडपती आहो का
हु पथिक मैं अनजान राहो का
है सिलसिला ये थकती निगाहों का
मैं चलता रहा और चलता गया
समय भी हरपल मुझको छलता गया
मैंने माँगा नही था सिवा कुछ पल सुकून के
फूल की नही थी अभिलाषा मुझे
मन में ना ही कोई थी आशा नई
पग पग वो कांटे ही बिछाता गया
हु पथिक मैं अनजान राहो का
है सिलसिला ये थकती निगाहों का
