Saturday, November 21, 2015
की इक बार फिर से वो हंसी रात आ जाए
जिसमे हो तुम और महकता सा नशा
मचले हम भी उस आगोश में खोकर के इस कदर
वही सावन की घटा झूम कर फिर आज आ जाये
की इक बार फिर से वो हंसी रात आ जाए...........................
जिनमे राते थी अजनबी और हर लम्हा था बेवफा
मेरा मन कहता था रुक जा लेकिन वो नही था थमता
जो रुक जाते वो लम्हे वो कायनात रुक जाती
वो तबस्सुम तेरे चेहरे का देखकर चांदनी थी इतराती
उड़ के हवा के झोको संग वो मेरी यादो में चले आये
की इक बार फिर से वो हंसी रात आ जाए,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
Friday, November 20, 2015
सुविचार
मित्रों प्रेम उम्र के किसी भी पड़ाव पर हो सकता है किसी भी क्षण वो किसी मासूम बच्चे की खिलखिलाती हुई हंसी भी हो सकती है
किसी लड़खड़ाते कांपते कदमो को सहारा देने पर भी हम असीम े आनंद और प्रेम की अनुभूति होती है तो क्यों न हम प्रेम के इन अनंत स्वरूपो में डूब जाये मोह और ईर्ष्या रुपी जहर को त्यागकर
किसी लड़खड़ाते कांपते कदमो को सहारा देने पर भी हम असीम े आनंद और प्रेम की अनुभूति होती है तो क्यों न हम प्रेम के इन अनंत स्वरूपो में डूब जाये मोह और ईर्ष्या रुपी जहर को त्यागकर
हे ईश्वर।।।।।।।।।।।।।।
निर्मल मन
निर्मल मन
उफ्फ ये मुहब्बत के कीड़े जो मानते ही नही है
कभी कुछ भूल जाते है कभी
कुछ याद आता है ये कैसा है भवर ये जिसमे हम खोये रहते है बड़ा नादान है ये दिल की
जो कहना नही माने मैंने रोका बहुत है फिर भी कहते गुस्ताख दिल है ये
है दिल के ये फशाने भी ग़ज़ब
के
जिनको पढना नही आता हम
क्यों उलझे से रहते है अपने ही ख्यालो में
हमारा गम भी इसमें है है
ढेरो खुसिया भी इसमें ही
मैंने रोका बहुत फिर भी
गुजर जाता है उस गली से ही
उफ्फ ये मुहब्बत के कीड़े
जो मानते ही नही है
जीवन ??????????????????????/
कुछ बाते मुझे ये सोचने पर
विवस कर देती है की त्रेता युग में महाराज दशरथ की तरह प्रतापी राजा शायद ही कोई
रहा होगा जिनके मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम जो भगवान् विष्णु के ही अवतार थे वो
पुत्र रूप में जन्मे थे जो चाहते वो पा
सकते थे धरती आकाश पाताल तीनो लोको में जयजयकार थी परन्तु लेशमात्र भी घमंड नही जो
श्रवण कुमार के तीर लगने से उनके माता पिता के श्राप को स्वीकार करते है वो चाहते
तो उनके माता पिता से झूठ भी बोल सकते थे या उनके सामने ही नही जाते परन्तु
उन्होंने ऐसा कुछ नही किया और आज कल मैं लोगो को देखता हु की थोड़े से पैसे अन्जाने
मात्र से उनकी परिभाषा ही बदल जाती है उनकी नैतिकता, उनका दायित्व,धर्म ,कर्तव्य
हर चीज से विमुख हो जाते है क्यों हम अपने पूर्वजो से महान विभूतियों से कुछ नही
सीखते क्यों इतने घमंडी और कर्तव्य विमूढ़ हो जाते है की स्वयं को ही भूल जाते है इससे
अच्छा तो अपना अतीत ही था
हे ईश्वर
|||||||||||||||||||||||||||||
Wednesday, November 18, 2015
हे ईश्वर |||||||||||||||||||||||||||||
कुछ बाते मुझे ये सोचने पर
विवस कर देती है की त्रेता युग में महाराज दशरथ की तरह प्रतापी राजा शायद ही कोई
रहा होगा जिनके मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम जो भगवान् विष्णु के ही अवतार थे वो
पुत्र रूप में जन्मे थे जो चाहते वो पा
सकते थे धरती आकाश पाताल तीनो लोको में जयजयकार थी परन्तु लेशमात्र भी घमंड नही जो
श्रवण कुमार के तीर लगने से उनके माता पिता के श्राप को स्वीकार करते है वो चाहते
तो उनके माता पिता से झूठ भी बोल सकते थे या उनके सामने ही नही जाते परन्तु
उन्होंने ऐसा कुछ नही किया और आज कल मैं लोगो को देखता हु की थोड़े से पैसे अन्जाने
मात्र से उनकी परिभाषा ही बदल जाती है उनकी नैतिकता, उनका दायित्व,धर्म ,कर्तव्य
हर चीज से विमुख हो जाते है क्यों हम अपने पूर्वजो से महान विभूतियों से कुछ नही
सीखते क्यों इतने घमंडी और कर्तव्य विमूढ़ हो जाते है की स्वयं को ही भूल जाते है इससे
अच्छा तो अपना अतीत ही था
हे ईश्वर
|||||||||||||||||||||||||||||




